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:: ققنوس در باران | مجلهی کوچک |
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| نویسنده: ندا.ح, در ۰۳ / ۰۷ / ۸۶ |
| تعداد بازدید: |
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۱
آه، تو ميداني
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ميداني که مرا
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سر ِ بازگفتن ِ بسياری حرفهاست.
هنگامي که کودکان
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در پس ِ ديوار ِ باغ
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با سکههای فرسوده
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بازی کهنهی زندهگي را
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آماده ميشوند.
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ميداني
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تو ميداني
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که مرا
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سر ِ بازگفتن ِ کدامين سخن است
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از کدامين درد.
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۲
دورههای مجلهی کوچک ــ
کارنامهی بردهگي
با جلد ِ زرکوباش...
چه بهآساني احتضار ِ فضيلت است
از بودن و ماندن
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گزير نيست.
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و اندوه ِ خويشتن را
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شامگاهان
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به چاهساری متروک
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درسپردن،
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فرياد ِ درد ِ خود را
در نعرهی توفان
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رها کردن،
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و زاری جان ِ بيقرار را
با هياهوی باران
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درآميختن.
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که عمر
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چه شاهانه ميگذارد
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به شهری که
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ريا را
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پنهان نميکنند
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و صداقت ِ همشهريان
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تنها
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در همين است.
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۳
به هنگامي که همجنسباز و قصاب
بر سر ِ تقسيم ِ لاشه
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خنجر به گلوی يکديگر نهادند
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من جنازهی خود را بر دوش داشتم
و خسته و نوميد
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گورستاني ميجُستم.
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کارنامهی من
دورههای مجلهی کوچک
با جلد ِ زرکوباش!
□
دريغا که فقر
ممنوع ماندن است
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از تواناييها
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به هياءت ِ محکوميتي; ــ
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ورنه، حديث ِ به هر گامي
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ستارهها را
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درنوشتن.
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ورنه حديث شادی و
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از کهکشانها
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برگذشتن،
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لبخنده و
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از جرقهی هر دندان
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آفتابي زادن.
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۴
با بوی گرسنهگي
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در رهگذرها
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با جلد ِ طلاکوباش.
لوطي و قصاب
بر سر ِ واپسين کفارهی مُردن ِ خلق
به خفّت ِ از خويش
تاب ِ نظر کردن در آيينه نبود:
احساس ميکردم که هر دينار
نه مزد ِ شرافتمندانهی کار،
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که به رشوت
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لقمهييست گلوگير
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تا فرياد برنيارم
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از رنجي که ميبرم
از دردی که ميکشم
۵
ماندن بهناگزير و
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بهناگزيری
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به تماشا نشستن
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بزرگترين ِ دروغها را
به لقمههايي بس کوچک
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مبدل ميکنند.
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و دَم فروبستن ــ آری ــ
به هنگامي که سکوت
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تنها
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نشانهی قبول است و رضايت.
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دريغا که فقر
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چه بهآساني
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احتضار ِ فضيلت است
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به هنگامي که تو را
از بودن و ماندن
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چاره نيست;
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بودن و ماندن
و رضا و پذيرش.
۶
در پس ِ ديوار ِ باغ
کودکان
با سکههای کهنهبِسوده
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بازی ِ زندهگي را
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آماده ميشوند...
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آه، تو ميداني
ميداني که مرا
سر ِ بازگفتن ِ کدامين سخن است
از کدامين درد.
۲۳ اسفند ِ ۱۳۴۴
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:: ققنوس در باران | چشم اندازی دیگر |
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| نویسنده: ندا.ح, در ۰۳ / ۰۷ / ۸۶ |
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با کليدی اگر ميآيي
تا به دست ِ خود
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از آهن ِ تفته
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قفلي بسازم.
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گر باز ميگذاری در را،
تا به همت ِ خويش
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از سنگپارهسنگ
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ديواری برآرم. ــ
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باری
دل
در اين برهوت
ديگرگونه چشماندازی ميطلبد.
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قاطع و بُرّنده
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تو آن شکوهپاره پاسخي،
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به هنگامي که
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اينان همه
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نيستند
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هم بدانگونه که باد
در حرکت ِ شاخساران و برگها، ــ
از رنگهای تو
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سايهييشان بايد
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گر بر آن سرند
که حقيقتي يابند.
هم به گونهی باد
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ــ که تنها
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از جنبش ِ شاخساران و برگها ــ
و عشق
ــ کز هر کُناک ِ تو ــ
□
باری
دل
در اين برهوت
ديگرگونه چشماندازی ميطلبد.
خرداد ِ ۱۳۴۵
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